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कब लिख पाये – रश्मि मृदुलिका

कब लिख पाये कलम मेरे जज्बात,
चल कर रूक गए शब्दों के अहसास।
अनकही बाते मन में उलझी रही कहीं,
दुनिया ने चाहा, बस वही लिखती रही।
कहाँ से लाते छुपी हुई झुठी मुस्कान,
कहाँ से पाते दबी हुई मीठी झंकार।
नकाब झीना चेहरे को ढ़क न पाया,
अनछुआ आहत मन पीड़ा कह न पाया।
शब्दों की कलाकारी और करामात,
रूक न पाये भावों के बेतरतीब जमात।
रास्ता ढूंढे काग़ज़ की काली रेखाएं,
मंजिल न पाये बैचेन सहमी सीमाएं।
– रश्मि मृदुलिका, देहरादून




