कविता – ज्योती वर्णवाल

अपनों के साथ बिताए पल
बीतते वक्त के साथ, यादें ही तो रह जाती हैं,
वो हंसी, वो ठिठोली, अक्सर बहुत याद आती हैं।
साल का एक दिन, बस परिवार के नाम हो,
बिना किसी फिक्र के, खुशियों भरी शाम हो।
यादों का पिकनिक
सब साथ हों, जैसे पिकनिक पर जाते थे,
वो शोर-शराबा, वो पल जो हम साथ बिताते थे।
महफ़िल सजे, जिसमें अपनों का प्यार हो,
पकवानों की महक से, घर फिर गुलज़ार हो।
मम्मी के हाथों की वो घाटी और कचौड़ी,
प्यार के मसालों की, जिसमें रत्ती भर न हो कमी थोड़ी।
पापा की पसंद की वो कटहल के कोफ़्ते की सब्ज़ी,
(भले ही बैंगन देख, उनकी नाक थोड़ी सिकुड़ती) ।
आलू चुनकर खाते हुए, उनका वो अंदाज़ निराला,
फिर से देखना चाहती हूँ, वो नज़ारा भोला-भाला।
रिश्तों की मिठास
पापा के हाथों का वो एक निवाला पाना है,
फिर से उनकी छोटी ‘गुड़िया’ बन जाना है।
दिल के हर कोने से, सारा तनाव मिटाना है,
अपनों के बीच बस, खुशियों को ही सजाना है।
गलती किसी की भी हो, उसे तुरंत भुला देना,
रूठे हों अगर अपने, तो झट से मना लेना।
क्योंकि ये पल ही तो हैं, जो जीने का बहाना हैं,
अपनों के साथ ही, असली स्वर्ग पाना है।
– ज्योती वर्णवाल ,नवादा, बिहार




