कविता (डांस बार) – जसवीर सिंह हलधर

होटल में महँगी कारों से सुंदरियां मटक मटक आतीं ।
ऊँची एड़ी की चरण पादुका पहने चलती इठलातीं ।।
पिछली कविता में मैंने बस प्रारंभिक दृश्य दिखाया था ।
आगे का दृश्य देखकर तो मेरा मन खुद घबराया था ।
पी पी कर मदमस्त हुई थी आँखों में लाली छायी ।
शब्द बहकने लगे लवों पर बातों में मस्ती आयी ।
एक बात सौ बार कहें एक दूजी से यूँ बतीयातीं ।।
होटल में महँगी कारों से सुंदरियां मटक मटक आतीं ।।1
दो तीन पैग के सेवन से अब तन में बिजली सी डोली ।
सखी चलो अब नृत्य करेंगे एक दूसरे से बोली ।
मदमस्त हुए इस मौसम में कुछ पुरुष दोस्त भी घुस आये ।
उन्हें मटकते देख वहां कुछ और दोस्त भी ललचाये ।
मीका के भौंडे गीतों पर नच नच कामुकता बरसातीं ।।
होटल में महँगी कारों से सुंदरियां मटक मटक आतीं ।।2
थिरक थिरक नर्तन करतीं दोषी था मादक पानी अब ।
देही ने खो दिया नियंत्रण काबू नहीं जवानी अब ।
एक नहीं दो पेग नहीं प्यालों पर प्याले गटक रहीं ।
कुछ तो सखियों के साथ मस्त कुछ पुरुषों में भी मटक रहीं ।
नांच नांच मदमस्त हो रहीं ठुमक ठुमक ढुंगे मटकातीं ।।
होटल में महँगी कारों से सुंदरिया मटक मटक आतीं ।।3
रंगीन रोशनी की छवि में हो रहा वासना का नर्तन ।
एक दूजे को नर मान मान करतीं आपस में आलिंगन ।
खुली अधखुली आंखें अब घिर रहीं नृत्यमय आहों में ।
कुछ तो सखियों के साथ रहीं कुछ थी पुरुषों की बाहों में ।
मर्दों को पीछे छोड़ रहीं बाहों में बाहें उलझातीं ।।
होटल में महँगी कारों से सुंदरियां मटक मटक आतीं ।।4
तन के वस्त्रों ध्यान नहीं मदमस्त नशे में घिरी हुईं ।
कुछ मर्दों की बाहों में थीं कुछ नृत्य फर्श पर गिरी हुईं ।
अब सफर रात खत्म हुआ और भोर सुबह की हो आयी ।
दिखते लिखते रजनी निकली अक्षरजननी भी घबरायी ।
आधुनिक काल के दृश्य देख, आँखें ‘हलधर’ की शर्मातीं ।।
होटल में महँगी कारों से सुंदरियां मटक मटक आतीं ।।5
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून , उत्तराखंड




