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कसक (कहानी) – किशन लाल शर्मा

utkarshexpress.com -पिता की असमय मृत्यु ने मोहन के जीवन की दिशा ही बदल दी।परिवार का सहारा अचानक छिन्न गया। उसे रेलवे में अनुकम्पा पर नौकरी तो मिल गयी, पर उसे अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी।अब घर की जिम्मेदारी, बहन-भाइयों की पढ़ाई और रोजमर्रा की चिंताएं उसके कंधों पर आ गयी।
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसे आगरा में पोस्टिंग मिली थी।परिवार गांव में रहता था इसलिए वह साप्ताहिक अवकाश या छुट्टी में गांव आता था। इस बार वह गांव आया तो ताऊजी ने कहा,”मोहन एक रिश्ता आया है, मेरे मित्र बिशन की बेटी है, उसे बचपन मे मैने गोद में खिलाया है। तुम लड़की देख आओ।”
कुछ क्षण चुप रहने के बाद मोहन बोला,”ताऊजी अभी शादी की बात न करे।अभी तो परिवार को सम्हालना ही बड़ा काम है।”
ताऊजी उसे समझाते हुए बोले,”बिशन मेरा मित्र हैं, उनकी बेटी को मैने बचपन मे गोद में भी खिलाया है।”
मोहन के बोलने से पहले जगदीश बोला,”चलेंगे। हम दोनों लड़की देखने चलेंगे।”
जगदीश, ताऊजी का बड़ा बेटा था। वह मोहन से उम्र में बड़ा था और टीचर था। जगदीश लोगों के बीच गुरु के नाम से मशहूर था,मोहन भी उसे भाई न कहकर, गुरु के नाम से ही सम्बोधित करता।वह गुरु का बहुत सम्मान करता था,उसकी बात सुनकर मोहन चुप रहा।
बिशन स्वरूप, खान भांकरी स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे। यह रोड साइड का छोटा सा स्टेशन था। यहाँ पर सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती और उनमें गिनती के लोग चढ़ते उतरते। ट्रेन आने का समय होता,तब प्लेटफार्म पर लोग नजर आते और ट्रेन जाते ही फिर से प्लेटफार्म पर सन्नाटा पसर जाता।
अगले दिन मोहन, अपने भाई जगदीश के साथ, ट्रेन से खान भांकरी स्टेशन पहुंचा। गांव से चलते समय ताऊजी ने एक चिट्ठी दी, जिसमे लिखा था,
लड़के को भेज रहा हूँ,आप लडक़ी दिखा देना। रिश्ते की बात करने से पहले, लड़का लडक़ी एक दूसरे को देख ले।
खान भांकरी पहुंचकर जगदीश और मोहन, स्टेशन मास्टर ऑफिस पहुंचे।कार्यरत सहायक स्टेशन मास्टर बोला,”उनकी ड्यूटी दो बजे तक थी।वह क्वाटर पर चले गए।”
“उनका क्वार्टर कौनसा है?”जगदीश ने पूछा।
“मैं छोड़ आता हूँ।”
स्टेशन के पीछे स्टाफ क्वार्टर बने हुए थे, एक पॉइंट्समेन उन्हें ले गया।
एक क्वार्टर के बाहर एक लडक़ी खाट पर बैठी कढ़ाई कर रही थी। उसकी सधी हुई उंगलियां रंग बिरंगे धागों से फूल बना रही थी। पॉइंट्समैन उससे बोला,”ये लोग बड़े साहब से मिलने आये हैं।”
वह चला गया। जगदीश ने चिट्ठी उस लडक़ी को दी। वह अंदर चली गयी। चिट्टी पढ़ते ही बिशन स्वरूप बाहर दौड़े चले आये और आत्मीयता से दोनों को भीतर ले गए।
और बैठकर बातचीत होने लगी। उनके पांच लड़के और एक लडक़ी थी। दो लड़के अजमेर में सर्विस में थे जबकि बाकी पढ़ रहे थे। लडक़ी उनके पास ही रहती थी। वह दौसा में पढ़ती थी, जो खान भांकरी से पांच किलो मीटर दूर था। चाय नाश्ता करने के बाद उनकी पत्नी भी बातचीत में शामिल हो गयी। बेटी को बिशन स्वरूप ने यह नहीं बताया था कि ये लोग उसे देखने आए हैं।इसलिए वह बेझिझक जैसे रोज घर में रहती, वैसे ही घूम रही थी।सांझ ढलने पर जगदीश बोला,”ट्रेन का समय हो रहा है, अब चले।”
“ट्रेन में अभी समय है, तब तक खाना बन जायेगा।”
और लड़की ने ही पूड़ी सब्जी,हलवा बना दिया ।
लौटते समय जगदीश ने पूछा,”कैसी लगी लड़की।”
मोहन ने आंखे झुका ली-“मुझे अभी शादी नहीं करनी।”
“तेरी शादी की उम्र है।लड़की में कोई कमी हो,तो बता।”
जगदीश की बात सुनकर मोहन चुप रहा।
मोहन की बात सुनकर जगदीश हंसकर बोला,”लड़की सुंदर है, होशियार है, और खाना कितना स्वादिष्ट बनाया था।मुझे तो पसन्द है।”
घर लौटने पर ताऊजी ने भी वही प्रश्न किया। मोहन ने तो शादी से इनकार किया,पर जगदीश बोला,”लड़की सुंदर और होशियार है, आप हां कर लो।”
और दशहरे के दिन बिशन स्वरूप अपने स्वजनों के साथ आये और रिश्ता पक्का हो गया। लड़का लड़की के नाम से शादी का मुहूर्त बीस महीने बाद का निकला। जल्दी शादी के चक्कर मे किसी तरह का उपाय नहीं अपनाया।
अपनी ड्यूटी और घर की जिम्मेदारी निभाने में मोहन का दिन कटते गए, पर मन मे एक कसक पलने लगी।
“रिश्ता हो गया। रिश्ते से पहले मैं लडक़ी देखने भी गया था,पर मैंने उसे रिश्ते की दृष्टि से देखा ही नहीं।”
मोहन चाहता था,उसे एक बार, शादी से पहले अपनी मंगेतर को देखने का अवसर मिल जाये।और ऊपर वाले ने सुन ली।
मोहन के होने वाले बड़े साले कमल की शादी तय हो गयी,उसे भी निमंत्रण मिला। बारात बांदीकुई आनी थी। मोहन के शादी में जाने की चर्चा परिवार में चली। रस्म रिवाज व परम्परा के अनुसार लड़का कुंवारे मांडे ससुराल नहीं जा सकता,पर सीधे बारात में शामिल हो सकता था।
मोहन को सूचना मिली थी कि बारात में लड़कियां भी आएगी।उसकी मंगेतर तो कमल की बहन थी।
और मोहन का मन प्रफुल्लित था,रिश्ते से पहले न सही,लेकिन शादी से पहले मंगेतर को देखने का अवसर मिलने जा रहा था।मोहन दूसरे दिन जब बारात विदा होने वाली थी,तब वह गया। सब ससुराल पक्ष के लोग मिले, पर वह नहीं,जिसके लिए वह गया था।बारात में लड़कियां आयी ही नहीं।
और उसकी इच्छा पूरी न हो सकी।
और वह सोचता, काश होने वाली पत्नी को देखने का अवसर शादी से पहले मिल जाय।
और कुछ महीनों बाद दूसरा अवसर आ गया।
वह आगरा से गाँव जाता,तब बांदीकुई अपनी बहन के घर जरूर रुकता। बड़े ताऊजी की बेटी, उनके पति यानी मेरे बहनोई बांदीकुई में टी सी थे। उन्हें स्टेशन के पास क्वार्टर मिला हुआ था।वह ट्रेन से बांदीकुई गया,जैसे ही बहनोई के घर गया,वह बोले,”आज तो बिशन स्वरूप बेटी के संग अस्पताल आये थे।स्टेशन पर है, ट्रेन से वापस जायेगे।”
मोहन का दिल खुशी से धड़क उठा।अपनी मंगेतर को देखने की इच्छा लिए वह बहनोई के साथ स्टेशन पहुंचा, लेकिन उसके प्लेटफार्म पर कदम रखने से पहले ही ट्रेन रवाना हो गयी।
और दूसरी बार भी उसका अपनी मंगेतर को देखने का सपना अधूरा रह गया।
दो अवसर आये,पर दिल की इच्छा पूरी न हो सकी तो उसने सोचा क्यों न वह भांजी के संग खान भांकरी चला जाये। वह स्वयं क्वार्टर पर नही जाएगा पर भांजी को भेजकर उसे स्टेशन पर बुला लेगा। पर उस दौर की सामाजिक मर्यादाएं और झिझक ने उसके पाव बांध दिए और मन मे आये विचार को मूर्त रूप न दे सका।
और इसी कशमकश में बीस महीने बीत गए और शादी का दिन आ गया।
और मोहन का सपना, शादी से पहले मंगेतर को देखने का अधूरा रह गया।
उसका जीवन पत्नी के साथ दिन,महीना, साल बनकर गुजरता रहा और अब आधी सदी बीत चुकी है। आज भी जब वह पीछे मुड़कर देखता है, तो एक कसक दिल में उठती है,कि वह शादी से पहले अपनी मंगेतर को न देख सका। (विभूति फीचर्स)

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