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क़िस्मत खोटी हलधर की – जसवीर सिंह हलधर

मंडी के नंबरदारों ने छीनी रोटी हलधर की !
सरकारी ठेकेदारों ने काटी चोटी हलधर की !
आजादी मांगी थी उसने केवल भूख गरीबी से ,
कर्जे के घातक वारों ने तोड़ी सोटी हलधर की !
चिकन परोसा जाता है जो राज भवन की थाली में ,
ध्यान लगाकर देखो उसको ताजी बोटी हलधर की !
संसद के खिड़की दरवाजों पर जो पर्दे दिखते हैं ,
मुझको ये दिखते हैं यारो फटी लंगोटी हलधर की !
रोटी कपड़ा पैदा करता आया है जो शदियों से ,
तन पर कपड़ा नहीं उसी के गिरवीं झोटी हलधर की !
सात दसक की आज़ादी में बस हमने ये पाया है ,
अब तक सारी सरकारों ने ख़ाल खसोटी हलधर की !
इधर उधर से कर्जा लेकर फसल उगाता जी भर के ,
जूए से भी बदतर खेती घायल गोटी हलधर की !
भूख गरीबी से लड़ने के जुमले खूब सुने हमने ,
सरकारी फाइल में बंदी क़िस्मत खोटी हलधर की !
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून




