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क्षणभंगुर – प्रदीप सहारे

 

लेकर सपने,

सो कर जागे।

ऊँचाइयों की उमंग,

साथ संग-संग।

ईश्वर को करते,

बार-बार वंदन।

आया है दिन,

जाना है लंदन।

सुबह की भागमभाग,

नहाए-धोए,

छुए बुज़ुर्गों के चरण।

कुलदेवता का स्मरण।

“सब शुभ होगा” –

करते आराधन, मन ही मन।

किसी के सपने,

किसी के अपने।

लेकर अरमानों को साथ,

उड़ा वह

आसमान की ओर।

छूटी ज़मीं से डोर।

ऊँची उड़ी

ख़्वाहिशों की डोर।

मुस्कराते चेहरे चारों ओर।

थोड़े ही क्षणों में सहज,

काल हो गया असहज।

दिखाया उसने

अपना चेहरा क्रूर।

कुछ समझ पाते,

हो गए मजबूर।

पल भर में हुए

अपने अपनों से दूर।

सब जीवन है —

क्षणभंगुर।

– प्रदीप सहारे, नागपुर, महाराष्ट्र

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