खोखले रिश्ते – रेखा मित्तल

हर बार बचाती हूं मैं अपना रिश्ता
कमजोर होने से, टूट जाने से
ऊपर से मज़बूत दिखने वाले रिश्ते
अंदर से कितने खोखले हो चुके हैं
ऐसा नहीं कि वह तोड़ना चाहता है
पर जोड़ना भी तो नहीं चाहता
हर बार मुझे ही समझना पड़ता है
वह तो समझना भी नहीं चाहता
जब भी चाहती हूं मैं
उन्मुक्त आकाश में उड़ना
घायल कर देते हैं उसके शब्द
खींच लेता है वह डोर मेरी
घेर लेते हैं उदासी के बादल
इतनी वाचाल सी मैं
अचानक से खामोश हो जाती हूं
और लेती हूं धैर्य की चादर
करती हूं इंतजार किसी
पगली पवन के झोंके का
जो उड़ा ले जाए मेरी उदासी
किसी बरसात की ठंडी बूंदों का
जो बहा ले जाए मेरी खामोशी
कितना मुश्किल है अपने रिश्तों को
सहेजना, संभालना और सिलना
हर बार यह जिम्मेदारी
मेरी ही क्यों होती है?
जब चुप्पी साथ लेती हूं मैं
पर बवंडर तो भीतर चलता है
मुस्कुराती हूं हर पल जमाने के साथ
पर खामोशी की कीमत तो चुकाती हूं मैं.
-रेखा मित्तल, चण्डीगढ़




