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गजल (हिंदी) – नीलांजना गुप्ता

हे प्रभू तुम्हें आचमन मैं क्या करूँ,
बस यही दृगधार ही मेरा प्यार है।
जगत में निराकार है सत्ता तेरी,
किन्तु अन्तस्थल में तू साकार है।।
है नहीं तुझसे गिला कि क्या दिया,
मनुज तन सबसे बड़ा उपहार है।
तेरी सेवा में समर्पित हूँ सदा,
बस मेरे जीवन का यह आधार है।
जीवन रूपी सरिता में गोते बहुत,
देह नौका की तू ही पतवार है।
पतित पावन कहते हैं तुमको प्रभू,
शरणागत हूँ अब करो उद्धार है।
भोग भावों का औ माला प्रेम की,
हृदय का आसन करो स्वीकार है।
अधम होकर भी प्रभू निश्चिंत हूँ,
क्योंकि तुमको पातकी से प्यार है।।
नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश




