मनोरंजन
ग़ज़ल – रीता गुलाटी

सजते रहे हैं बिकने को बाजार की तरह,
सहते हैं जुल्म भी गुनहगार की तरह।
सहते रहे है दर्द को आज़ार की तरह,
करते रहे है काम वफादार की तरह।
कैसे बचाऊ खुद को नही आज है पता,
मिलते रहे भला क्यों ख़रीद़गार की तरह।
करतें हैं वो चोरी की लगता नही है डर,
कुछ लोग खड़े हो गये दीवार की तरह।
आने को हैं करोना लगे आज ड़र हमें,
ख़ामोश मत रहो,तुम कि बेजार की तरह।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़




