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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

आज जग मे बड़ा दगा पाया,
खूब रोका, नही नफा पाया।
नेकियाँ बहुत की जमाने मे,
सबकी आँखो मे ही गिला पाया।
झोपड़ी मे रहे या महलों मे,
आयतों में तुम्हे खुदा पाया।
हाय क्यो अब मचा दी हलचल?
तेरी ऩज़रो मे बेवफा पाया।
जिंदगी अब अधूरी सी लगती,
यार तुमको नही भुला पाया।
जिंदगी भर शजर कमाता था,
टूटकर अब गिरा कटा पाया।
खाकसारी नही दिखी जग मे,
काश जग से ज़फा ह़टा पाया।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़




