मनोरंजन
ग़ज़ल – रीता गुलाटी

देखता हरदम रहा तू आ छतों पर आज फिर।
दिल जो जोड़ा,बात कर ले,तू खतो से आज फिर।
छा गयी काली घटा,नभ डूबता अँधकार मे।
लड़ रही है ये हवाएँ, बादलो से आज फिर।
आप को भीगा सा देखा,हाय इन आँखो ने जब से
यार खेले संग मिलकर बारिशों से आज फिर।
जाम पीकर आशिकी मे अक्स बस तेरा दिखे।
यार तुमको ही पाऊँ मैकदो मे आज फिर।
नींद मुझको अब कहां सोने भी देगी रात को।
वक्त मेरा अब कटेगा,आँसुओं से आज फिर।
पास होकर दूर कितना,फिर भी अपना सा लगे।
आँख भर कर आज देखूँ चाहतों से आज फिर।
नभ के नीचे,है बिछौना आज इक मजदूर का।
जूझते फिरते रहे हैं मुश्किलों से आज फिर।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़




