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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

वो नशे मे बहुत बहकते हैं,

जाम ले फूल सा वो खिलते हैं।

 

हाय क्यो दर्द मे वो घुलते हैं,

रात दिन आग सा सुलगते हैं।

 

नूर आँखों मे आज हैं चमका,

यार अरमां मेरे मचलते हैं।

 

हुस्न बारे बहस ये दिल करता,

प्यार की हम गवाही रखतें हैं।

 

हुस्न भी बेपनाह है तेरा,

खूबसूरत अदा पे मरते हैं।

 

रात दिन हम रहे थे तन्हा,

ख्याब आँखो मे ही मचलते हैं।

 

प्यार मे इस कदर थे हम डूबे,

गीत मीठे तुम्हारे सुनते हैं।

 

यार ढूँढे तुम्हें अँधेरे मे,

वो उजालों मे हमको मिलते हैं।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

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