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ग़ज़ल – विनोद निराश

दिल ये कोई बेजान नहीं,
क्या ये तुमको भान नहीं।
हर पल दिखाते हो बेरुखी,
अपनेपन का ध्यान नहीं।
बार – बार दुःख देना भी,
प्रेम की ये पहचान नहीं।
आँखों की पीड़ाऐ तो देखो,
क्या आँखों में जॉन नहीं।
प्रेम पथ कठिन था पर,
भूलना भी आसान नहीं।
आज अहसास हुआ वो,
जिसका अनुमान नहीं।
बस अपनी ही कहते हो,
मेरी सुनना आसान नहीं।
वक़्त ऐसे बदला निराश,
जैसे अपनी पहचान नहीं।
– विनोद निराश, देहरादून
(शुक्रवार 26 सितम्बर 2025)




