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गीतिका – मधु शुक्ला

श्वेत श्याम स्मृतियों के कण दृग, में जब-जब पड़ जाते हैं,
होंठों पर मुस्कान साथ जल, आँखों में ले आते हैं।
बीते पल मन आंगन आकर , ताजा करते सुधियों को,
सुमन मधुर यादों के प्रायः, वे जमकर बरसाते हैं।
जीवन पथ पर खार अनेकों, घनीभूत पीड़ा देते ,
किन्तु समय के साथ हमें वे ,जीना भी सिखलाते हैं।
जब भोला नादान हृदय यह, मिले कपट छल से जग में,
संघर्षों के अंगारे तब , ताप नहीं पहुँचाते हैं।
सुधियों की अनमोल धरोहर, बिना अकेलापन न मिटे,
खट्टे-मीठे अनुभव ही तो, जीवन पथ महकाते हैं।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश




