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गीतिका – मधु शुक्ला

 

कपट द्वेष उर में बसाना नहीं था ,

अगर मीत को अरि बनाना नहीं था।

 

रही लालसा प्रेम की यदि हृदय में,

अहं को गले से लगाना नहीं था।

 

बुरे वक्त में मित्र‌ यदि चाहिए थे ,

समय पर नजर को चुराना नहीं था।

 

रही चाह‌ सम्मान की उर सखा यदि ,

क्षमा, नम्रता को भुलाना नहीं था।

 

जिन्हें लक्ष्य अपनत्व ‘मधु’ कामना थी,

उन्हें प्यार धन से निभाना नहीं था।

— मधु शुक्ला,सतना,मध्यप्रदेश

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