मनोरंजन
गीत – मधु शुक्ला

सुंदर काया पाकर साथी , तुम इतना इतराते क्यों हो।
ईश्वर की रचना को अपनी ,कह कर प्रेम जताते क्यों हो।
मात – पिता के संरक्षण से,खार रहित जीवन पथ पाया।
हाथ पकड़ शुभचिंतक गुरु ने,उन्नति से परिचय करवाया।
कौन किया अस्तित्व सुमन को, सुरभित मीत भुलाते क्यों हो….।
लगन परिश्रम की दौलत का , संघर्षों ने बोध कराया।
अपनों का प्रोत्साहन धन ही,लक्ष्य दीप की ज्योति बढ़ाया।
मंजिल पाकर प्रिय स्वजनों को,खुद से दूर भगाते क्यों हो…. ।
प्रेम,त्याग,ममता,करुणा बिन,जीवन सुमन नहीं खिलता है।
कृपा दृष्टि हो जब ईश्वर की , यश वैभव तब ही मिलता है।
विदित तुम्हें जब नियम प्रकृति का,अपने ही गुण गाते क्यों हो ….।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश




