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गीत- मधु शुक्ला

रीति सनातन सारे जग को भाती है।
पितृपक्ष के गुण सब दुनियांँ गाती है।।
बाढ़ आजकल आजादी की,आई है।
मतभेदों की गहरी दिखती,खाई है।।
एका पर खतरे की बदली, छाई है।
वृद्धाश्रम की रौनक आफत, ढाई है।।
ऐसे में पूजे पितरों को, नाती है।
पितृपक्ष के गुण सब दुनियाँ गाती है……।
आदर सूचक दिन ये हमको,प्यारे हैं।
इनके ऊपर हम अपना मन,वारे हैं।।
सीख बुजुर्गो के हम गहते ,तारे हैं।
निर्भर इन पर रहें समय के,धारे हैं।।
हमें सुरक्षित रखना उनकी,थाती है।
पितृपक्ष के गुण सब दुनियाँ गाती है……।
धर्म सनातन का यह प्यारा, मोती है।
इस पर मोहित शुचि मति प्रायः,होती है।।
श्रद्धा के बीजों को मन में, बोती है।
याद न पितरों की अब जग में,सोती है।।
अति आदर से संतति उनको ध्याती है।
पितृपक्ष के गुण सब दुनियाँ ,गाती है……।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश




