मनोरंजन

गीत – मधु शुक्ला

 

वर्तमान में अभिनय सब कुछ, सबको प्यारा लगता है।

भावों का संसार कैद में, हमको रखना पड़ता है।

 

सच्चाई का मोल नहीं अब, मुँह देखी बातें होतीं।

शुभचिंतक मुश्किल से मिलते, रिश्तों में घातें होतीं।

जमघट में रहकर भी मन को, तन्हा रहना खलता है…।

 

मृदु वचनों की सीढ़ी गह कर, स्वप्न सफलता के हँसते।

पर्दे में मन को रख कर जन, अभिनय को ओढ़े रहते।

भौतिकवादी युग में निशि दिन, प्रेम तड़पता मरता है….।

 

अभिनय का उपहार मनुज को, दिशा हीनता से जोड़े।

सहिष्णुता को धक्का देकर, मानवता से मुख मोड़े।

एकाकी जीवन का सपना, खुशी किसे दे सकता है….. ।

— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश

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