धर्म

“चातुर्मास विश्राम” संकल्पना का “विज्ञान – दर्शन” – डॉ जयप्रकाश तिवारी

utkarshexpress.com – कल देवशयनी एकादशी थी, और मान्यता है कि जगदाधर भगवान विष्णु अपने शयनकक्ष में अब चार माह विश्राम करेंगे। चातुर्मास की यह संकल्पना भारत भूमि पर उपजे जैन, बौद्ध धर्म में भी बहुत महत्व पूर्ण है। मन में प्रश्न उठता है कि जब पंचभूतात्मक प्रकृति अपना कार्य निरंतर, अनवरत कर रही है तब हमारी संस्कृति में इस विश्राम की संकल्पना क्यों? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है, और जब प्रश्न है तो कोई उत्तर भी होना चाहिए। आइए आज हम इसी प्रश्न पर पड़ताल करते हैं। यह प्रश्न वेदान्तियों, ज्ञान मार्गियों के लिए अपेक्षाकृत “कम” किंतु भक्ति मार्गियों के लिए “अत्यधिक” चिंतन का विषय है। वेदांती स्वाभाविक रूप से इसे जी रहे होते हैं, उनके लिए यह एक नवीनीकरण जैसा है किंतु भक्तिमार्गीयों के लिए एक सर्वथा नूतन आध्यात्मिक अनुभूति।

आखिर ब्रह्माण्ड नियंता कारण ब्रह्म “ईश्वर” शयन या विश्राम की स्थिति में क्यों चला जाता है? उसके अक्रियाशील अवस्था में सृष्टि का नियमन, ईशण और पोषण कैसे होगा? वस्तुतः यह संकल्पना एक रूपक है और इस रूपक के माध्यम से आध्यात्मिक संकेत है जो साधकीय जीवन में आध्यात्मिक प्रगति का आरोहण सूत्र भी है। अपने संपूर्ण मानवीय और सड़कीय जीवन में अपने वैश्विक, सामाजिक, पारिवारिक जीवन से शिथिल होकर अपने वैयक्तिक, निजी जीवन और कार्य प्रणाली पर पुनर्विचार के लिए। जन ईश्वरीय कार्य उसकी विरामावस्था में सकुशल संपादित हो सकता है तो क्या आपकी क्रिया बिना कोई कार्य अधूरा रह पाएगा? सोचिए इस पर। यदि नहीं तो आठ माह आप जगत के लिए क्रियाशील रहते हैं अब स्व के लिए, मौन होकर, शारीरिक रूप से अक्रियाशील होकर मानसिक कार्य कीजिए। कौन सा कार्य? वही जो आपके सतगुरु ने बताया, सिखाया, जिसका श्रवण किया है, उसपर मनन और निद्धयासा कीजिए। यह धार्मिक अवकाश बनाया ही इसलिए गया है कि अब अपने हृदय के आकाश, हृदयाकाश में झाकिये, उसी में विचरण कीजिए, उसी में स्थिर रहिए, भटकने की आवश्यकता नहीं। यही “देवशयनी एकादशी”, चातुर्मास व्रत का अध्यात्म भी है और विज्ञान भी। यह ब्रह्मांड के विराट चक्र, योनियों में आवागमन चक्र में स्व को ढूंढिए, इसका कारण ढूंढिए? कारण में आप पाएंगे “योनि भ्रमण” का एकमात्र कारण हमारा कृत कर्म है। प्रथम चरण में वर्ष के चार माह और बोध हो जाने पर अनवरत लगातार कर्म को भी अकर्म बनकर जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है, यह “चातुर्मास” की संकल्पना। सार्थकता इसकी यही है कि न यह संकल्पना मात्र न होकर जीवन की प्रक्रिया, अनिवार्य स्वभाव बन जाए। जिस प्रकार देव शक्ति जाग्रत रहे या प्रसुप्त सृष्टि में बाधा नहीं आती। उसी प्रकार परिवार हो या समाज, साधक को निष्काम, क्रिया करते हुए भी कर्ताभाव से अलग रहना है। यही गीता का सार “निष्काम कर्मयोग” है, यही समत्व दर्शन है और यही स्थितिप्रज्ञता है। जब जीवन में सम्यक रूप से ऐसी स्थिति आकर स्वभाव बन जाए, समझना चाहिए कि वही मनन करने वाला “मुनि” है, जीवन जीने वाला योगी है। अब उसके लिए न कर्म का महत्व है, न विकर्म का; न गुण का, न दोष का; न पुण्य का, न पाप का।उसके लिए न दिन का कोई अर्थ है, न ही रात्रि का। इन द्वंद्वों से ऊपर उठकर निर्द्वन्द हो जाना ही लक्ष्य है। इस अवस्था में उसकी दृष्टि “ईसावास्य ईदं सर्वम”, “सर्वम खल्विदं ब्रह्म”, मुंडक और बृहदारण्यक की शब्दावली में देशों दिशाओं में वही तो है, किससे राग और द्वेष करे? क्यों करे? ऐसी दिव्य दृष्टि हो जाती है। दृष्टा, दृष्टि और दृश्य का भेद मिट जाता है। अब समस्त द्वैत भाव का पूरी तरह विलोपन हो जाता है। इस स्थिति में वह अभय और निर्भय हो जाता है – “तत्र क: शोक: क: शोक: एकत्वं अनुपस्यति”। अब वह स्व को जन लेता है, पहचान लेता है, स्व स्वरूप का, आत्मस्वरुप का बोध हो जाता है। वह बोध है – “अहम ब्रह्मास्मि”। यह किसकी उपलब्धि है? यह उसी निष्काम, समत्व और अक्रियाशीलता की उपलब्धि है । यह गुरुपदेश “तत्वमसि” के मनन और निद्धयासन, स्थितिप्रज्ञता की परिणति है। यही इस चातुर्मास के मौन चिंतनप्रद ज्ञान का फल हल है। यह कर्मफल नहीं, ज्ञान फल है। और यदि फल न कहना चाहें तो यह स्वस्वरूपता का बोध है।

इस प्रकार हमारी संस्कृति और पंचांग के चार मास मानवीय चेतना के गहरे आरोहण और उन्नयन का एक सनातन स्वर्णिम दार्शनिक सूत्र है। यह मात्र एक धार्मिक अवधि नहीं, अपितु जीवन के विराट चक्र में आत्म-अन्वेषण और पुनर्संयोजन का एक दार्शनिक, आत्मान्वेषण के आध्यात्मिक पड़ाव है।

यह चातुर्मास अवधि “आत्मान्वेषण” का एक पुनीत अवसर है, अनुसंधान है जिसे धार्मिक संस्कारों से इसलिए जोड़ दिया गया है जिससे आप इसका सदुपयोग कर “अविद्या” और अविद्या जनित कार्यों को पहचानकर उससे मुक्त होकर “विद्या” को, परमतत्त्व को, “आत्मतत्व” को, “स्वस्वरूप” को प्राप्त कर सकें।

–  डॉ. जयप्रकाश तिवारी, बलिया, उत्तर प्रदेश

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