मनोरंजन

जब मेरा हाथ थामा था – रुचि मित्तल

 

जब तुमने धीरे से मेरा हाथ थामा था

हवा तक थम गई थी

और साँस जैसे

सीने में कहीं ठहर गई थी।

नज़रों की वो झीलें

कुछ कहती नहीं थीं

मगर दिल की धरती पर

हल्की हल्की बारिश होने लगी थी।

वो क्षण…

जब नयनों से नयन मिले थे

ना शोर था, ना स्वर

बस भीतर कोई राग जागा था।

मैं काँप उठी थी

तुम्हारी दृष्टि के उस नर्म स्पर्श से

जैसे किसी पवित्र मंत्र ने

मुझसे जीवन भर का व्रत ले लिया हो।

ना इकरार हुआ, ना इनकार

फिर भी सब कुछ

साफ़-साफ़ समझ आ गया था

प्रेम क्या होता है।

उस एक पल ने

मुझसे मेरा नाम, मेरी साँसें

और शायद मेरा वजूद भी

छीन लिया था…

और फिर उसी में लौटा भी दिया था।

रह रह कर याद आता है

वो पहला स्पर्श

तो होंठ नहीं,

रूह मुस्कुरा उठती है।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button