जल और रक्त की रेखा — प्रियंका सौरभ

जब सीमाओं पर बंदूकें बोलती हैं,
तब क्या भीतर की चुप्पियाँ मौन रहती हैं?
किसने खोला है बांधों का ताला,
जब देश ने अपने शहीदों को कंधा दिया ताज़ा?
पानी की धार में विष क्यों घुलता है?
क्या राजनीति अब नदियों की नब्ज़ पर उगता है?
सरहद पार जो गोली चलाए, वो शत्रु है,
पर जो भीतर दरार करे—वो कौन-सा पात्र है?
यह युद्ध अब दो नहीं, ढाई मोर्चों का है,
एक संगीन के पीछे, एक विचार के लोचा का है।
वो जो सत्ता की सीढ़ी चढ़ता है,
क्या उसे ध्वज का अर्थ नहीं समझ आता है?
यह नंगल का बांध नहीं, यह विश्वास का द्वार है,
इस पर ताला नहीं, सवाल लटकता भार है।
जब भगवंत नीति के नाम पर भावुकता बोता है,
तो हरियाणा का गला भी सिसकियों में रोता है।
देश जब एक स्वर में कहता है—‘बस बहुत हुआ’,
तब कोई क्यों छेड़ता है नदी की धमनियों को क्या और क्यों?
क्या यही समय था तालों की राजनीति का?
या यह वही ‘आधा मोर्चा’ है जिसे रावत ने पहचाना था?
वे न दंगों में साथ होते हैं, न दुख में दीवार,
वे विचारधारा की ओट में काटते हैं घर-परिवार।
उनकी दृष्टि में न देश है, न धर्म, न भाषा,
केवल सत्ता का खेल और स्वार्थ की भाषा।
किन्तु भूल न जाना,
भारत चुप है, पर अंधा नहीं।
जो आज ताले लगाते हैं,
कल लोकतंत्र उन्हीं पर ताले लगाएगा सही।
यह जल नहीं रुकेगा,
यह वह पुरखों की प्यास है, जो हाकिमों की धार से नहीं थमती।
और यह देश—यह कोई खेत नहीं,
जो हर फसल चुनाव के अंक में बो दी जाए।
यह देश महाभारत की स्मृति है,
यहाँ कृष्ण मौन नहीं रहते,
यहाँ अर्जुन भ्रम में नहीं डोलते,
यहाँ युद्ध न्याय का उत्सव है, और जय केवल सत्य की होती है।
प्रियंका सौरभ ,333, परी वाटिका, कौशल्या भवन,
बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा




