झोपड़ी और महल – नीलांजना गुप्ता

महल के सामने खड़ी हुई झोपड़ी
विचारों में निमग्न जड़ी हुई झोपड़ी
सोंचती है प्रतिपल महल के बारे में।
क्या कभी महल ने देखा है मुझे ?
कितने संताप सहती हूँ मैं,
धूप और ताप सहती हूँ मैं,
ठंड से ठिठुरती हूँ, काँप काँप जाती हूँ।
बादलों के तीरों से समूची बिंध जाती हूँ।
फिर भी नहीं करती क्रन्दन ,
सिर्फ मुस्कराती हूँ!
क्या कभी महल ने सोचा है मुझे?
देखकर महल में उगे हुए कैक्टस
सोचती है झोपड़ी।
क्यों सजा रखें हैं इसने आँचल में शूल,
ठुकरा कर रँग बिरंगे मुस्कराते हुए फूल।
जिसमें न पराग है, न खुशबू न कोमलता
रूखापन है, तीक्ष्ण दंश है, देते हैं व्याकुलता
झोपड़ी ने खोल रखें हैं हृदय के द्वार।
हर निराश्रय पथिक का वह बनती है आगार।
और फिर सोचती है झोपड़ी।
क्यों डाल रखें हैं इसने इतने ऊँचे परदे ?
यह महल कोई समाधिष्ट योगी है।
या फिर बगुला भगत सा ही ढोगीं है।
जो ढाँप लेना चाहता है अपने आप को,
या नहीं दिखाना चाहता उस पाप को।
जो प्रतिपल परदे की ओट में चलते हैं।
मजबूर झोपड़ियों को जिंदा निगलते हैं।
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश




