डॉ. सुधीर श्रीवास्तव बहुत ही शानदार अविस्मरणीय विषय पर कृतित्व रचा – एकता गुप्ता ‘काव्या’

utkarshexpress.com – आज भी मंथरा शब्द सुनकर जहां लोग अनगिनत बातें करते हैं वहीं हमारे सम्मानित प्रतिष्ठित नवोदय वैश्विक प्रज्ञान साहित्यिक संस्थान के मीडिया प्रभारी , मार्गदर्शक, लेखनी के सशक्त हस्ताक्षर, व्यंग्यकार, लेखक – यमराज मित्र की ख्याति लिए हमारे डॉ. सुधीर श्रीवास्तव* दादा जी आपने बहुत ही शानदार अविस्मरणीय विषय पर कृतित्व रचा । जिसका
प्रकाशन- यूनीक फील पब्लिकेशन, मुंबई, 2026 में हुआ। जिसका मूल्य – 250 रुपए है 180 पृष्ठों में संकलित जिसका ISBN – 978-93-7165-064-9 है।
यमराज मित्र के नाम से साहित्य जगत में चर्चित हमारे दादा डॉ. सुधीर श्रीवास्तव जी की नवीन कृति ‘मंथरा’ एक बहुआयामी काव्य संग्रह है। यह पुस्तक स्मृति शेष पूजनीया सासू माँ एवं यशः शेष ससुर जी युगल किशोर लाल श्रीवास्तव जी को समर्पित है, जो आपके पारिवारिक आत्मीयता को दर्शाता है। मातृ-शक्तियों कीमंगल शुभकामनाएँ हृदयस्पर्शी हैं।
आ० दादा का संक्षिप्त परिचय ही अपने आप में एक संघर्ष कथा है। 01.07.1969 को ग्राम बरसौनिया, मनकापुर, गोंडा (उ.प्र.) में जन्मे आपकी साहित्यिक यात्रा 1984-85 से प्रारंभ हुई। बीच में 2000-2001 में अस्वस्थता और 2020 एवं 2022 में पक्षाघात के आघात के बाद भी आपका साहित्य प्रेम अटूट रहा। यही जिजीविषा उनकी रचनाओं में भी दिखती है। आप ‘विमला ज्ञान साहित्य मंच’ के संरक्षक, ‘रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच’ के संरक्षक/प्रकाशक हैं और 1325 रचनाकारों का काव्यपाठ कराकर तथा 300 से अधिक नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित कर चुके हैं। नेत्रदान का संकल्प और देहदान की सार्वजनिक घोषणा आपके व्यक्तित्व की महानता को दर्शाती है।
‘मंथरा’ शीर्षक से यह प्रतीत होता है कि यह केवल पौराणिक चरित्र पर केंद्रित है, बहुत ही शानदार, जीवन के विविध रंगों का दर्शन कराती रचनाएँ सम्मिलित हैं। ‘माँ शारदे’, ‘रामराज्य’, ‘राम जी के बिना’, ‘रामनवमी मना रहे हैं’, ‘माता कौशल्या’, ‘कैकयी के राम’, ‘जनता की आवाज’, ‘आज का रावण’, ‘व्यंग्य – हिंदी मान पर सिर्फ मेहमान’, ‘हास्य – जीवन का हर अनुभव’, ‘किसान का जीवन’, ‘पर्यावरण संरक्षण का नारा’, ‘रोटी दिवस’, ‘भारत मिलाप’, ‘यमराज मेरा यार’ तक – विषयों का अद्भुत विस्तार है।
इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है – भक्ति, हास्य-व्यंग्य और सामाजिक चेतना का संगम। एक ओर ‘मंथरा’, ‘कैकेयी का कोप’, ‘सुंदर सा चित्र’ जैसी पौराणिक पृष्ठभूमि की कविताएँ रामकथा को नए दृष्टिकोण से देखती हैं, तो दूसरी ओर ‘व्यंग्य – मुझे विकास है’, ‘व्यंग्य – शरीराम का नारा लगाओ’, ‘मूर्ख’, ‘भूख’, ‘बेकाई’, ‘जनता की आवाज’ जैसी रचनाएँ आज के राजनीतिक और सामाजिक विद्रूप पर करारा प्रहार करती हैं। आप यमराज को मित्र बनाकर मृत्यु और जीवन के दर्शन को भी सहज हास्य में पिरो देते हैं।
भाषा आम बोलचाल की, अवधी की मिठास लिए हुए है, जो हमें ग्रामीण पाठक से लेकर शहरी पाठक तक सबको जोड़ती है। कहीं-कहीं व्यंग्य इतना तीखा है कि हँसी के साथ-साथ सोचने पर मजबूर कर देता है जैसे समाज को आईना दिखाया गया है और हमें सोचने समझने के साथ साथ बदलाव के लिए प्रेरित करती है है यह पुस्तक —
कुल मिलाकर ‘मंथरा’ केवल एक काव्य संग्रह नहीं, बल्कि एक साहित्य साधक की जीवंतता, सामाजिक चिंता और राम के प्रति अटूट आस्था का दस्तावेज है। हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ जीवन के यथार्थ को समझने के लिए यह पुस्तक संदेश प्रद प्रेरणादायक अनुकरणीय है। आपकी लेखनी अनवरत चलती रहे, हम बच्चों को सदैव प्रेरित करती रहे ।
पुस्तक समीक्षा
प्रकाशन- यूनीक फील पब्लिकेशन, मुंबई,
वर्ष – 2026
मूल्य – 250 रुपए ,
पृष्ठ – 180
ISBN – 978-93-7165-064-9
समीक्षक- एकता गुप्ता ‘काव्या’
‘मंथरा’ -सुधीर श्रीवास्तव, उन्नाव उत्तर प्रदेश




