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तीजा के तिहार – अशोक यादव

आवत होहीं गियाँ ओ, मोर भाई, ददा मन लेवाए ल।
पोरा अउ तीजा के तिहार म, मइके जाहूँ मनाए ल।।
मने-मन कुलकत हँव, फुरफुंदी बनके उड़ावत हँव।
कपड़ा ल जोर डारेंव, बिहनिया ले सोरियावत हँव।।

घेरी-बेरी निकल के देखत हँव, गली-खोर, अँगना म।
बारह महीना के परब ए, बंधागेंव मया के बंधना म।।
दाई के मँय ह दुलौरिन बेटी, ददा के सोनपरी आँव।
भाई के मँय ह मयारु बहिनी, परुवार के जुड़ छाँव।।

डेहरी म खड़े हे मोर बाबू, ए दे आगे मोला लेगे बर।
जावत हँव लइका मन ल धरके, ए जी संसो झन कर‌।।
भात रांध के तंय खाबे, हरिबे घर-कुरिया म अकेल्ला।
कहूँ मोर सुरता आही त, ससुरार भागत आबे पल्ला।।

बड़े किसान के तंय बेटा, बइला मन ल सुग्घर सजाबे।
बइला दउँड़ खेल म जीतके, बइला के आरती उतारबे।।
दीदी अउ बहिनी मन संग, सुख-दुख के गोठ गोठियाहूँ।
माथा म लाली सेंदूर, हाथ म तोर नाँव के मेहंदी लगाहूँ।।

करुहा करेला के साग खाके, रइहूँ भूखे-पियासे उपास।
ठेठरी अउ खुरमी बनाबो बिकट, बुता जाही मोर साध।।
नवा साड़ी पहिन के करहूँ पूजा, खुश हो जाही भगवान।
सिव-पारबती ले माँगहूँ जोड़ी, तोर लंबा उमर के बरदान।।
– अशोक कुमार यादव, मुंगेली, छत्तीसगढ़

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