मनोरंजन
तुम्हें पता है – रुचि मित्तल

तुम्हें पता है
इन दिनों तुम्हारी ख़ामोशी
हवा की तरह फैल गई है
हर तरफ़
जहाँ भी देखती हूँ
तुम्हारा चेहरा याद आता है
मगर उस पर मुस्कान नहीं होती।
मैं जानती हूँ
ज़िन्दगी सबको व्यस्त कर देती है
मगर दोस्ती का रिश्ता
कभी कैलेंडर से नहीं बंधता
वो तो दिल में रहता है
हमेशा, हर वक्त।
तुम्हारी नाराज़गी
मेरे लिए आईने जैसी है
जिसमें मैं खुद को देखती हूँ
और सोचती हूँ
कहाँ चूक गयी मैं?
मैं ये नहीं कहूँगी
कि वक़्त नहीं मिला
क्योंकि सच ये है
हम वक़्त निकालते हैं
उनके लिए…
जिनकी परवाह होती है।
आज..
मैं बस इतना कहना चाहती हूँ
कि दोस्ती का मौसम
फिर से लौट आए
क्योंकि कुछ रिश्ते
रूठते नहीं
बस इंतज़ार करते हैं
कि कोई उन्हें
फिर से गले लगा ले।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा




