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तुम किस पथ पर हो

हर देव तूने पूजे होंगे,
क्या पूजा कभी इंसान है?
क्यों भटक रहा है अँधेरे में,
जब तुझमें ही भगवान है।।

क्यों स्वार्थ तेरा इतना प्रचंड,
भूलोक पर कष्ट उगाता है?
फिर आँख बंद होने से पहले,
क्यों न राह सही अपनाता है।।

हैं पाप-पुण्य सब तुझमें निहित,
सब तेरा ही अवतार है।
है कर्म बड़ा या छोटा तेरा,
तू स्वयं का ही उद्धार है।।

तो लाख टेक ले माथा जग-जग,
पर यह अपराध कहाँ तक चलना है?
तुझको प्रायश्चित की ज्वालाओं में
अब धीरे-धीरे जलना है।।

है देव तेरा और दानव भी,
तू किसको स्वयं में बुनता है?
देख तेरा अंतर्मन इनमें से
किसको अपने भीतर चुनता है।।

यह अब तेरा निर्णय है,
तू केवल इसका निमित्त है।
पर क्या यह नहीं जानता तू सचमुच
क्या उचित और अनुचित है?
क्या उचित और अनुचित है?

— ललितप्रसाद जोशी

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