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दोहे – जसवीर सिंह हलधर

 

कवियों ने गाया नही ,सही समय पर द्वंद ।

राजाओं की शान में ,पढ़े क़सीदे छंद ।।

 

सफल नही कहला सके ,कुछ गुमनाम महान ।

मिला मौत के बाद में , कवियों को सम्मान ।।

 

जो समझें साहित्य को ,धन अर्जन औजार ।

चार दिनों की चांदनी ,मंचों का बाज़ार ।।

 

विजय किसी भी क्षेत्र में ,दिलवाती पहचान ।

अहंकार से मुक्त ही ,होते गुनी सुजान ।।

 

शक्ति निहित है शस्त्र में ,शास्त्र रहा आधार ।

क्षमा अहिंसा शीलता ,योद्धा का शृंगार ।।

 

युवा हृदय की हूक से ,जले क्रांति की आग ।

देश तभी आगे बढ़े, युवा खड़े हों जाग ।।

 

भूतकाल की नाव में ,सफर करे इंसान ।

वर्तमान पतवार है , जीवन नदी समान ।।

 

रक्त  नदी में तैरता ,मानव का इतिहास ।

मानवता ज़िंदा रही , ढो ढो कर संत्रास ।।

 

शक्ति प्रदर्शन के बिना , कौन करें विश्वास ।

राम धनुष ताने तभी , अंबुधि आया पास ।।

 

कविता युग संजीवनी ,कविता काल चरित्र ।

भूत काल नेपथ्य है ,वर्तमान चलचित्र ।।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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