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दोहे (संत कबीर) – निहारिका झा

जाति पांति को न मानें ऐसे संत कबीर।
निज हित से पहले रखें, दूजे जन की पीर।। 1।।
सादा जीवन ही रहा निज जीवन का सार।
दोहों में था सिखा दिया, मानव का आचार।।2।।
कुछ उनको हिंदू कहें कोई मुस्लिम जान। ,
हर विवाद फिर खत्म हुआ, फूल बन गई जान।।3।।
धन दौलत की चाह नहीं ,ऐसे एक फ़कीर।
सारे जग खातिर जिए,ऐसे संत कबीर।।4।।
– निहारिका झा खैरागढ़ राज, छत्तीसगढ़




