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निमिया लगाई दा – श्याम कुंवर भारती

 

पिया सवनवा में अंगना बनवाई दा।

टुटही मड़ईया तनी छवाई दा।

दुअरा पर निमिया गड़ाई दा ना।

 

करे दुअरा कीच किच मनवा होला मिच मिच।

भरे पानी अंगना बीच हमके आवे बड़ी खीझ।

पिया पक्की नरिया बनवाई दा।

हमके छतवा मंगवाई दा ना।

दूअरा पर निमिया…………..।

 

आइल सावन के महीना दिनवा भईल बा नगीना।

घमवा लागे बड़ी जोर चूये टप टप खूब पसीना।

पिया हमके कूलर नया मंगवाई दा।

गरमी से देहीया बचाई ला ना ।

 

बहे पवनवा बड़ी जोर उड़े मनवा बड़ा मोर।

देहिया देला झकझोर करे फुहार सराबोर।

पिया हमरे भईया के बुलवाई दा।

हमके नईहर पहुंचाई दा ना ।

 

सखियां झुलिहे झूला नईहर,

मरीहे पेंगवा सब सरासर ।

मनवा करे बार बार लुटब सावन के बहार।

पिया हरी सड़िया औरी चूड़िया पहिनाई दा।

हरी टिकुली मथवा लगाई दा ना ।

– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो,झारखंड

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