मनोरंजन

नूतन सृजन -सविता सिंह

सुना दे वही राग मल्हार

फिर यह घन बरस जाए|

अवनि का यह रोम-रोम

पुलक पुलक निखर जाए||

ना जाने कैसा रिश्ता है

धरती और अंबर का|

रहते हर पल समानांतर

प्रेम है दूजा उनका||

दूत बनाकर अंबर ने

वारिधर से भेजा संदेश|

बुझा दे तू प्यास उनकी

राह तके वो निर्निमेष||

जज्ब हो गई धरा में

घन की वह हर एक बूँद|

पाकर उनका स्नेह स्पर्श

पलकें उनकी गई मूँद||

चहक रही है प्रकृति

द्रुम लता शाखा हर्षित|

हरित दुकुल को पहन

धरा भी दिख रही सस्मित||

चहुँ ओर खिले सुमन

सुवासित सुभाषित उपवन

अलि को भी मिला मकरंद

भ्रमरो का हो रहा गुंजन|

हुआ जो यह सुखद मिलन

था जैसे कोई अनुबंध

गा रहे सब गीत और छंद

कैसे ना हो नूतन सृजन||

-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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