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पुरुष की जीत – रेखा मित्तल

 

पुरुष जीता तो श्रेय उसके पौरुष को

इतराया वह देख अपना नाम शिखर पर

पर जब तुम हारे तो तुम्हारे संग अवसाद में

सतत् खड़ी रही,बन तुम्हारी संगिनी

तुम उसके आंचल का कौर भिगोते रहे

वह तुम में साहस का बल भरती रही

उसकी तो हंसी में भी आंसुओं का अंश था

मगर तुम्हारी हार में जीत का दंभ था

उसने छोड़ अपने ख्वाब तुम्हें चुना

तुमने चुना अपने सपनों का महल

अपनी प्रीत में सौंप तन मन तुम्हें

छली गई अपने से ही अनगिनत बार

तुम्हारी जीत का सेहरा नहीं सजा

कभी भी उसके माथे पर

हार की कश्ती में बिठाई गई हर बार

जब भी तुम टूटे जीवन में

तो चट्टान सी हिम्मत बन खड़ी अडिग

कही गिरे तुम तो भी संबल बन

साथ चली जीवन भर

पर तुमने तो कभी साथी भी नहीं माना

माना हमेशा अपनी आजादी में एक विघ्न

घर की दहलीज पर खड़ी

करती रही इंतजार जीवन भर

स्त्रियां धरा की संतप्त धरोहर

जिनके हिस्से बसंत नहीं

आता हैं हमेशा पतझड़

पर अंततः जीत कर भी हारता हैं पुरुष

उसके तेज से, उसकी खामोशी से

हारी हुए स्त्री जीत जाती हैं

हर बार अपने मौन से।

– रेखा मित्तल, चंडीगढ़

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