मनोरंजन

प्रिय – रुचि मित्तल

 

मैंने भी

तेरे शब्दों की उस भीगती छाँव में

अपने मन के भीग जाने की

कई ऋतुएँ देखी हैं।

तू कहे और मैं

अपने जीवन के सब एहसास बोल दूँ

तो क्या

तेरी तृष्णा की अभिलाषा उतर जाएगी?

 

हाँ…

आषाढ़ की वो पहली बूँद

जो मन की सूखी धरती पर गिरती है

वो मैं हूँ शायद…

जो तेरे इंतज़ार की तपिश से जन्मी है।

 

कभी साँझ को

जब तुम अपनी आँखों से मेरा नाम पढ़ो

तब मैं

बारिश से भीगी किसी कसम की तरह

तेरे अधरों पर उतर आऊँगी।

 

और उस रात

चाँदनी अपनी पूरी सम्पूर्णता से बरसेगी

पर प्रेम…

वो मेरी चुप्पियों से टपकेगा

तेरे हृदय की झील में।

 

“तुम्हारी…वही,

जो हर धड़कन में समाई है।”

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

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