बसंत पंचमी : चेतना के पुष्पन और मां सरस्वती की आराधना का पर्व – पवन वर्मा

utkarshexpress.com – जब धरती के हृदय में शीत की निस्तब्धता पिघलने लगती है, जब वायु में मंद सुगंध घुल जाती है और जब पीले पुष्प दिशाओं को आलोकित करने लगते हैं, तब भारतीय चेतना में बसंत का आगमन होता है। यह वही समय है जब प्रकृति स्वयं को संवारती है और मानव मन भी भीतर से जागृत होने लगता है। इसी चेतना के उत्कर्ष का नाम है बसंत पंचमी।
यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि यह उस क्षण का स्मरण कराता है जब ज्ञान, वाणी और विवेक को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। बसंत पंचमी भारतीय परंपरा में ज्ञान की साधना, विद्या के आरंभ और आत्मिक शुद्धता का पवित्र अवसर है।
वैदिक दृष्टि में वसंत और ज्ञान का संबंध
वैदिक साहित्य में वसंत ऋतु को विशेष महत्ता प्राप्त है। वेदों में ऋतुओं को केवल मौसम नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन का आधार माना गया है। वसंत को सृजन और चेतना की ऋतु कहा गया है। यजुर्वेद का प्रसिद्ध मंत्र
वसंतो ब्राह्मणोऽस्य मुखम् इस बात को स्पष्ट करता है कि वसंत को ब्राह्मण अर्थात ज्ञान का मुख माना गया है।
मुख से वाणी का प्रवाह होता है और वाणी ही विद्या का माध्यम है। यही कारण है कि वसंत और सरस्वती का संबंध केवल परंपरा नहीं, बल्कि वैदिक दर्शन की स्वाभाविक परिणति है। अथर्ववेद में वाणी, मेधा और प्रज्ञा की स्तुति इस बात की पुष्टि करती है कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान को दैवीय स्वरूप प्राप्त है।
पौराणिक मान्यताएँ और मां सरस्वती का प्राकट्य
पुराणों के अनुसार जब सृष्टि की रचना के उपरांत चारों ओर नीरवता व्याप्त थी, तब ब्रह्मा जी के आदेश से मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ। उनके वीणा नाद से ध्वनि, भाषा और भाव का जन्म हुआ। सृष्टि को गति और अर्थ मिला।
मां सरस्वती को श्वेत वस्त्रधारिणी कहा गया है, क्योंकि वे शुद्धता और सात्त्विकता की अधिष्ठात्री हैं। वे केवल पुस्तकों की देवी नहीं, बल्कि विवेक, संयम और संस्कार की शक्ति हैं। बसंत पंचमी का दिन उनके पूजन के लिए इसलिए चुना गया, क्योंकि यही वह समय है जब प्रकृति और चेतना दोनों अपने सबसे कोमल और निर्मल रूप में होते हैं।
सरस्वती पूजन की परंपरा और पीतवर्ण का आध्यात्म
बसंत पंचमी पर मां सरस्वती के पूजन में पीले रंग का विशेष महत्व है। पीतवर्ण वसंत ऋतु, ऊर्जा, समृद्धि और प्रज्ञा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मां सरस्वती को सरसों के फूल अर्पित किए जाते हैं। सरसों के ये पीले पुष्प खेतों, गांवों और जीवन में उल्लास का संदेश देते हैं।
पूजन के समय मां को मीठे पीले चावलों का भोग लगाया जाता है, जिसे परंपरागत रूप से केसरिया भात कहा जाता है। केसर या हल्दी से रंजित यह भोग केवल स्वाद का नहीं, बल्कि श्रद्धा और सात्त्विक भाव का प्रतीक है। यह भोग यह संकेत देता है कि ज्ञान का स्वरूप मधुर, पवित्र और प्रकाशमय होना चाहिए।
अक्षरारंभ संस्कार : शिक्षा की पवित्र शुरुआत
भारतीय परंपरा में शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं माना गया, बल्कि उसे संस्कारों से जोड़ा गया। बसंत पंचमी के दिन बच्चों का अक्षरारंभ संस्कार इसी भावना का प्रतीक है। इस दिन बच्चे को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।
गुरु, माता-पिता या परिवार का वरिष्ठ सदस्य बच्चे के हाथ से “ॐ”, “श्री” या वर्णमाला का प्रथम अक्षर लिखवाता है। यह क्षण केवल लेखन की शुरुआत नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली ज्ञान यात्रा का शुभारंभ होता है। मां सरस्वती से यह प्रार्थना की जाती है कि बालक की बुद्धि निर्मल रहे और उसका ज्ञान लोककल्याण में लगे।
कला, संगीत और साधना का पर्व
बसंत पंचमी कलाकारों, संगीतज्ञों और साहित्यकारों के लिए विशेष महत्व रखती है। वीणा, पुस्तक, लेखनी और वाद्य यंत्रों का पूजन किया जाता है। यह परंपरा यह स्मरण कराती है कि कला और विद्या तभी फलदायी होती हैं, जब उनमें अहंकार नहीं, साधना होती है। भारतीय दर्शन में कला को आत्मा की अभिव्यक्ति माना गया है और बसंत पंचमी उसी अभिव्यक्ति का उत्सव है।
प्रकृति और आत्मा का संवाद
वसंत ऋतु में जैसे वृक्षों में नए पत्ते आते हैं, वैसे ही मानव जीवन में भी आशा और उत्साह का संचार होता है। खेतों में लहलहाती सरसों, आम की बौर और कोयल की मधुर कूक ये सभी प्रकृति के मंत्र हैं, जो मानव को भीतर से जागृत करते हैं।
बसंत पंचमी इस संवाद को पहचानने का अवसर है। यह पर्व सिखाता है कि जैसे प्रकृति निरंतर नवसृजन करती है, वैसे ही मानव को भी अपने भीतर ज्ञान, विवेक और करुणा का विस्तार करना चाहिए।
आध्यात्मिक अर्थ : तम से सत् की ओर
बसंत पंचमी का आध्यात्मिक भाव अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है। मां सरस्वती का पूजन बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की साधना है। यह पर्व मानव को स्मरण कराता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो विनय लाता है, जो अहंकार को नहीं, बल्कि विवेक को बढ़ाता है।
जब सरसों के पीले फूल मां के चरणों में अर्पित होते हैं और केसरिया भात का भोग लगता है, तब यह केवल परंपरा नहीं रहती, बल्कि चेतना का उत्सव बन जाती है। (विनायक फीचर्स)




