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भोजपुरी कविता (नवकी रजाई) – श्याम कुंवर भारती

माघ जाड़ा के पाला जब पड़ा
सब घुसे मंगाई नवकी रजाई।
कौड़ा कौड़ी खोजे सब लोग बड़ा,
ठिठुरत सिहरत तापी के जाड़ा भगाई।
साग सरसों चना के बना त मजा
लहसुन मिरचा धनिया चटनी जिया ललचाई।
मकई के रोटी बनी त जमी
गोइंठा के आग सेकी परोसी माई।
विहान शीतलहरी चले तब सिहरी,
बाबूजी के खटिया पर कम्बल ओढ़ाई।
छत चढ़े नवकी नवहर बहुरिया
घाम तापे करिया लमहर लट लटकाई।
वियाकुल देवर देख दुल्हिन मुस्काए
खांसत सास ससुर चम्मच पीआवे दवाई।
बांका बलम रात खेत पानी बरावे,
खाना देवे जब जाई पिया पकड़े कलाई।
– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो, झारखंड




