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मधुमास घन – अनुराधा पाण्डेय

 

जगाते श्याम जलवाही, हृदय मधुमास घन सजना!

दिलाकर याद सावन की, जगाए प्यास घन सजना!

हृदय के शुष्क कोरों को, मिले जब पावसी छींटे…

बढ़ा तब ताप प्रणयन का,रचाए रास घन सजना!

२*

नहीं इन बादलों से मैं,पृथक पर्याय हूँ प्रियतम!

नहीं हो द्र्ष्ट जो पीड़ा,वही समवाय हूँ प्रियतम!

सजल बादल हृदय कण के पिघलने को हुए आतुर…

न तोड़े नैन ने बन्धन,सतत निरुपाय हूँ प्रियतम!

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका दिल्ली

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