मनोरंजन

महिला दिवस – सविता सिंह

नारी दिवस की ज़रूरत नहीं

शुभ दिवस

अच्छा लगा था

जब बॉस ने बिना कहे,

बिना जताए, बिना बताए

ऑफिस की मेज़ पर

सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक

चुपचाप रख दिया था,

ये भावनात्मक रिश्ता

दिल से निकल कर

सीधे दिल तक पहुँच गया

बस इतना ही तो चाहिए।

और बस…

हो गया नारी दिवस।

उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,

कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।

उन्होंने खिड़की से आती धूप को

बड़े करीने से

एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,

ताकि मेरी नींद

ज़रा और ठहर सके।

आँखें भर आती हैं…

हम सच में

इतने से ही खुश हो जाते हैं।

कोई आडंबर नहीं,

कोई शोर नहीं

बस इतनी-सी ही तो बात है।

आज काजल नहीं लगाया तुमने,

दो भौंहों के बीच

वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।

क्या हुआ—उदास हो क्या?

बस इतना पूछ लेना ही

काफी होता है

वरना हम तो

इतनी-सी केयर पर भी

पागल हो जाते हैं।

सच कहूँ

अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह

हर दिन मिलते रहें,

तो फिर किसी

महिला दिवस की

ज़रूरत ही नहीं।

स्त्री आधारशिला है सृष्टि की

उसे  दिवस की जरूरत नहीं

जरूरत है बदलते हुए

भावनात्मक पर दृष्टि की।

सविता सिंह मीरा , जमशेदपुर

 

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