मनोरंजन
मुक्तक- मणि अग्रवाल

सारे जग से तुम्हें छुपाकर, आँखों में मैंने बैठाया,
बुरी नज़र से बचे रहो तुम, एक डिठौना माथ सजाया,
जब काजल की नीयत पर भी, मेरे मन में शक़ जागा तो-
बन्द पलक के द्वार किये फिर, सपनों से पहरा लगवाया।
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मन के द्वारे पर रंगोली किसने आज बनाई है,
अहसासों ने दीप जलाकर रौनक ख़ूब बढ़ाई है,
हमने सिर्फ़ पुरानी चिठ्ठी खोली अपनी यादों की-
एक ज़रा-सी आहट सुनकर चाहत क्यों पगलाई है।।
-मणि अग्रवाल”मणिका”, देहरादून उत्तराखंड



