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मुलाकात – रेखा मित्तल

 

अजनबी सी मुलाकात

बात कुछ यूं हुई

उसने थोड़ी उलफत से की

मैने कुछ नज़ाकत से

थोड़ी बेतकल्लुफी में

लिपटे मधु से अल्फ़ाज़

उसने आज मुझसे बात की

न कोई शिकायत

न कोई शिकवा

न ही रिश्ते में ऊष्मता

न ही प्रेम का इज़हार

बस एक भावहीन सी मुस्कराहट

जैसे हम दोनों के बीच कुछ था ही नहीं

बात कुछ यूं हुई…

वह बोलता रहा

मैं सुनती रही वह आवाज़

जिसको सुनकर ही खिल उठता था

मेरा रोम रोम..

पर आज कुछ अजनबी सी लगी

कभी धड़कता था मेरा दिल

सुनकर उसका नाम

आज कुछ पराया सा लगा

आंखो से अश्क छलक पड़े

खामोशी सी छा गई

कहना बहुत कुछ था

मगर जिव्हा मौन हो गई

बात कुछ यूं हुई…

लौट आई,

छोड़ बहुत कुछ अधूरा

खुद को अपने में ही समेटती हुई

टूटी उम्मीदें, असहाय सी

दुपट्टे को मुंह में दबाए

वो गुलमोहर के गुंचे

जो मुस्कराते थे संग मेरे

आज कुछ उदास थे

हर आंसू कह रहा एक कहानी

कुछ उसकी कुछ मेरी जुबानी

उसने बेरुखी से बात की

मैने खामोशी से विदा ली

बात कुछ यूं हुई…

-रेखा मित्तल, चण्डीगढ़

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