मनोरंजन
मेरी कलम से – रुचि मित्तल

दीवारों दर पे जब मुझे तन्हाइयाँ मिली,
छत की मुंडेर पर मैंने पंछी बुला लिए।
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मुझको डरा रहे हो ज़माने खराब से,
बदनाम मेरा नाम भी दुनिया में कम नहीं।
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एक नज़र तूने क्या देखा मुस्कुराकर जिंदगी
सिर्फ खुशियाँ हैं हृदय में दर्द सारे मिट गये।
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कब तलक़ खामोश बैठू कब तलक़ सहती रहूँ,
कब तलक़ इस जिंदगी का हर गरल पीती रहूँ।
ज़ख्म जो दिल पे लगे हैं सच बता तू ऐ खुदा,
कब तलक़ इन आँसुओं से ज़ख्म ये सीती रहूँ।
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दुनिया की सोहबतों का असर देख भाल कर,
अपने ही आप पे यक़ी बढ़ने लगा है अब।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा



