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मेरी कलम से  – रुचि मित्तल

फूल चाँदनी पर्वत अंबर सब कुछ अच्छे लगते हैं,

जब से मुझको इश्क़ हुआ है सपने सच्चे लगते हैं।

 

कतरा के मुझसे ख़्वाब में आगे वो बढ़ गये,

रहते थे साथ जो कभी परछाई की तरह।

 

अजब इंसान हो उल्फ़त की बातें खूब करते हो,

मगर क्या जानते हो इश्क़ में दिल टूट जाते हैं।

 

कोई खबर भी है तुझको दीवानगी की मेरी,

ज़माना पढ़ के ग़ज़ल मेरी रो रहा है अब।

 

पलक झपकी थी बस मैंने यूँ मोती टूट कर बिखरे,

कि जैसे जपते-जपते कोई माला टूट जाती है।

– रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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