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मेरे लिए – रश्मि मृदुलिका

आज पांव नहीं थके, आज पलकें थकी है

रात भर ख़्यालों में, ये तुम्हारे संग जगी है…!

​तन्हा पहले भी थे, तन्हाई में वो बात न थी,

तुम आये हो या अभी बरसातें बाकी है…..!

​इस दर्द की दवा तुम थे, तुम मर्ज बन बैठे

बीमार भी हम और चरागर भी हम ही है….!

न अब कोई शिकवा, न कोई गिला बाकी है,

ज़िन्दगी क्या है बस ये कशमकश बाकी है…!

उठा कर फेंक दिया है हर एक आंसू को हमनें

​ये जो ज़ख़्म है, बस इन जख्मों में सड़न बाकी हैं…!

-रश्मि मृदुलिका, देहरादून , उत्तराखंड

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