मैं गौरैया – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

मैं गौरैया सुनो कहानी।
मेरी आँखों में है पानी।
मैं गौरैया जूझ रही हूँ।
नीड़ पुराने खोज रही हूं।
क्या गुनाह हमने कर डाला।
कठिन पहेली बूझ रही हूँ।
जिससे थी अब तक अनजानी।।1
कहाँ गये दरवाजे-खिड़की
झिर्री एक न मुझको दिखती
रोशनदान न चिमनी अब तो।
रहने की अब जगह न मिलती।
जीवन आज हुआ बेमानी।।2
बच्चे अब न रहे हमजोली।
पीछा मेरा करती टोली।
चुपके से रँगते पंखों को।
खेल गुलाबी नीली होली।
मुझे याद आती तब नानी।।3
पहले घर में सब मिल रहते।
कुछ स्थान बचा कर रखते।
पंखों, खम्बों, शहतीरो पर।
वहीं घोंसले मेरे सजते।
संगति थी जानी-पहचानी।।4
गाँव-शहर की रहने वाली।
मेरी खातिर जगह न खाली।
बंद हुए घुसने के रस्ते।
दरवाजों खिड़की में जाली।
मन में छाई इक वीरानी।।5
बढ़ा प्रदूषण अतिशय भारी।
दम घुटने से मैं अब हारी।
सूक्ष्म तरंगें मुश्किल करतीं।
जाने कैसी लगी बिमारी।
जान बचाने की तब ठानी।6
मानव ने बस्ती छुड़वाई।
हवा नहीं बहती पुरवाई।
दूर वनों में अब बस जाऊँ।
कह कर सबको टाटा-बाई।
बन रह जाऊँ एक कहानी।।7
गौरैया की सुनो कहानी।
सुन नयनों में आये पानी।
-कर्नल प्रवीण त्रिपाठी,
नोएडा, उत्तर प्रदेश




