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मैं चला पंथ में निज अकेला – निहारिका झा

मैं चला पंथ में निज अकेला ही था,
मन में न क्षोभ था द्वेष भी न धरा।
सोचता ही चला आगे क्या है डगर,
जिंदगी क्यूँ विषमता भरी है मेरी।
क्या खता थी मेरी या थी किस्मत मेरी,
कौन मंजिल है जाना नहीं था पता।
मैं चला पंथ में निज अकेला ही था।
धीरे धीरे कठिन पल गुजरता गया,
राह में इक अकेला मुझे वो मिला।
वो भी गर्दिश में था और तन्हा भी था,
था निराशा भंवर में फंसा जो हुआ।
लगता जीवन से वो भी था हारा हुआ,
मैने देखा उसे ,उसने देखा मुझे,
उससे नाता लगा कुछ पुराना ही था,
साथ जब हम चले राह आसाँ हुई,
जिंदगी में मधुरता रही अब मेरी।
हम कदम बन के संग संग वो जो चला।
मंजिलें जिंदगी अब तो हासिल हुई।
अब बहारों ने दिल में बसेरा किया,
अब कहां पंथ में मै अकेला रहा।
-हम कदम बन के संग संग .।।।
– निहारिका झा खैरागढ़, राज छत्तीसगढ़




