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युवा जोश, जज्बे और धैर्य का नाम है कलीम खान – सुधीर श्रीवास्तव

utkarshexpress.com –  होनहार, युवा पत्रकार/संपादक/सामाजिक कार्यकर्ता कलीम खान के जोश, जज्बे और धैर्य को देखते हुए अनायास ही यह विचार आया कि इस युवा के बारे में कुछ लिखूँ। इसके पीछे कोई योजना/स्वार्थ या बेवजह तारीफ कर उसे चने की झाड़ पर चढ़ने के लिए प्रेरित करना नहीं है। वैसे भी मेरा खुद का व्यक्तित्व ही थोड़ा आड़ा टेढ़ा है, साफ-सुथरी, स्पष्ट रूप से रखी गई मेरी बातें, विचार कुछ लोगों को अच्छे नहीं भी लगते हैं, तो अधिसंख्य मेरी इस भावना के मुरीद भी हैं। दोनों ही स्थितियों में मुझे कोई फर्क भी नहीं पड़ता। क्योंकि मैं ऐसा ही हूँ।
अब बात करते हैं सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित फर्स्ट एडिटर हिंदी दैनिक/अंग्रेजी साप्ताहिक के युवा संपादक और निकहत कलीम फाउंडेशन के संस्थापक कलीम खान जी की, तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि कम शब्दों में इनके बारे में कहा जा सकता है कि ‘युवा जोश, जज्बे और धैर्य का नाम है कलीम खान’। आज जब अपवादों को छोड़ दें तो हर कोई मान, सम्मान के पीछे भाग रहा है, धन कमाने के सारे हथकंडे अपनाने की जुगत में लगा रहता है।तब शांत, सौम्य, धीर, गंभीर और आत्मसंतोषी कलीम अपने स्व सिद्धांतों को कस कर पकड़ कर रखते हैं। एक सामान्य प्राणी के रूप में वाणी, व्यवहार और साफ सुथरी छवि के प्रति सचेत रहने का निरंतर प्रयास इनकी थाती है। सामाजिक कार्यों में यथा संभव योगदान के अलावा पत्रकारिता और प्रकाशन के क्षेत्र में इनका आदर्श युवाओं को प्रेरित करने वाला है। अपने समाचार पत्र में देश के विभिन्न क्षेत्रों के रचनाकारों की रचनाएं, साहित्यिक गतिविधियों को महत्व देते ही नहीं है। सबसे बड़ी बात है, कि आप में जो धैर्य है, वह सराहनीय है। रचनाओं, समाचारों के भेजते समय जब संवेदनशील साहित्यिकार, नियमों का उलंघन करते हैं, निर्देशों को नजर अंदाज करते हैं, तब भी आप बड़ी शालीनता से उसे सहज रूप में ही लेते हैं। बतौर साहित्यकार और विभिन्न मंचों का शीर्ष पदाधिकारी होकर भी मैं खुद इतना धैर्य नहीं रख पाता, और उत्तेजित हो ही जाता हूँ, ऐसे समय में कलीम भाई दिमाग में आ ही जाते हैं। सच कहूँ तो आश्चर्य भी होता है कि समाचार पत्र के नियमित प्रकाशन के अनेकानेक क्रियाकलापों, तनावों के बीच आखिर इतना धैर्य भला कैसे रख पाते हैं?
इतना ही नहीं एक संपादक होने के नाते बेवजह जहाँ- तहाँ दखल देने और अहमियत पाने की ख्वाहिश नहीं रखते। अपने आप को समेटकर रखते हैं, बावजूद इसके हर किसी से आत्मीय भाव मिलते, संवाद करते हैं, दिलों में उतर जाते हैं। इसका मुझे निजी अनुभव बोधगया के एक आयोजन में हुआ। तब तक मैंनें उनका केवल नाम ही सुना था, पहचानता नहीं था। फिर भी आपने आगे बढ़कर अपना परिचय देते हुए जो भावात्मक सम्मान दिया, उससे उनके व्यक्तित्व का बोध स्वाभाविक रुप से हो ही गया।
अंत में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि अनुजवत कलीम खान जी जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए निश्चित ही खुद की बड़ी लकीर खींचने में जरुर सफल होंगे। मुझे लगता है उनके वाणी, व्यवहार और संवेदनशील व्यक्तित्व से अन्याय सफलताएं स्वत: उनके स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए राह देखती आतुर हो रही होंगी, जो कुछ लोगों के लिए ईर्ष्या का कारण भी हो सकती हैं।
प्रिय अनुज के सामाजिक/पत्रकारिता के क्षेत्र में उज्जवल भविष्य की अशेष शुभकामनाओं के साथ……।

–  सुधीर श्रीवास्तव, गोण्डा,  उत्तर प्रदेश

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