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विजय पथ – नीलकान्त सिंह नील

मैं तनय अपने स्वप्न बेचे
तो स्वप्न तात हेतु क्रय किया
मैं वो हू जिसने पाप किए
तो निज तात ने चैन पाया।।
पुरस्कार रहा या प्रतिकार
प्रतिफल यहा जो मुझको मिला
अनुभूति के इस प्रासाद में
कहो! मेरा परिचय क्या मिला ??
हे तात! कभी तो सुन लो तुम
मेरी उलझन भरी कहानी
कभी तो पूछ लो कहा गई
मेरी वो खुश भरी जवानी।।
तुम्हारी चाहतों के लिए
अपनी चाहतें ही मार दी
तुम्हारा काम पहले करू
अपने काल यू हि गुजार दी।।
बीत रहे पल सोच-सोच कर
आखिर मेरी पहचान क्या है
प्राण के बढ़ते कर्म-रथ पर
तात ! विजय पथ निशान क्या है ?
– नीलकान्त सिंह नील, बेगूसराय, बिहार




