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वो एक बात – ज्योत्सना जोशी

 

कहीं एक किनारे से शिरा पकड़ने की

कोशिश करती हूं ,

वो दूसरे छोर से छूट जाता है,

एक उम्र खुद को खो देने के बाद

अचानक उस रिश्ते में अपनी तलाश

ज़ारी होने लगती है,

अपने होने को वो कई पैमानों पर

जतलाता रहा,

मेरा होना क्या स्वीकार पाया है ?

प्रेम में होना कितना स्वाभाविक और सरल है,

जबकि उसकी स्वीकारोक्ति उतनी ही

असहज अस्वाभाविक,

वो एक बात जो कहनी थी तुमको

अपने मनचाहे धागों में लपेटकर तुम

भावों की गांठें सुलझाते रहे

तुमने न जाने कितने प्रतिबिम्बों का

सहारा लिया होगा,

इतने कोमल अहसास तक पहुंचने के लिए।

– ज्योत्स्ना जोशी,  देहरादून

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