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शफर ई इकलोता – अनिरुद्ध कुमार

दरक जाला गाछी,
उजड़ जाला खोता।
गजब खेला जगके,
समइया के गोता।।
बिखर जाला सपना,
बहक जाला तोता।
लोग पीटें छाती,
छोड़ देला रोता।।
अमर केबा आइल,
अजब देखीं होता।
चलल कब केहूके,
धरल देह अलोता।
एक पलके मजमा,
कफन ओढ़े सोता।
अंत माटी माटी,
देह लोगें धोता।
मोह माया नखड़ा,
हाँथ जोड़ें पोता।
जार देला काया,
खोर नाता-गोता।।
देख दुनियादारी,
लोग बांटे न्योता।
कौन पूछे वाला,
बोझ काहें ढ़ोता।।
लोग बोले जिनगी,
फूल काँटा बोता।
अंत सबकर एके,
शफर ई इकलोता।।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड




