धर्म

शरद पूर्णिमा महारास : मन के चंद्रमा पर इंद्रियों का नृत्य – डॉ. दीपक गोस्वामी

utkarshexpress.com – शरद पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में निर्मल चंद्रप्रकाश, शीतलता, भक्ति और प्रेम का अनुपम पर्व है। वर्षा के बाद स्वच्छ आकाश और चंद्रमा की उज्ज्वल आभा इस रात को विशेष बनाती है। इसी अवसर पर श्रीकृष्ण के महारास का स्मरण होता है, जो केवल नृत्य नहीं बल्कि प्रेम, समर्पण और अहंकार के विसर्जन का आध्यात्मिक प्रतीक है। शरद ऋतु और पूर्ण चंद्रमा के संयोग को कई क्षेत्रों में कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। को जागर्ति यानी कौन जाग रहा है, इस भाव के साथ लक्ष्मी पूजन और रात्रि जागरण की परंपरा जुड़ी है। चंद्रप्रकाश में खीर रखने की मान्यता लोकपरंपरा में है, पर इसे वैज्ञानिक औषधि नहीं मानना चाहिए। इस पर्व का आध्यात्मिक संकेत है कि जैसे निर्मल आकाश में चंद्रमा स्पष्ट दिखता है, वैसे ही विकार और अहंकार से मुक्त मन में विवेक और प्रेम का प्रकाश अधिक स्पष्ट होता है।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की रासपंचाध्यायी रासलीला का मुख्य आधार है। शरद की चंद्रज्योत्स्ना, यमुना तट, वृंदावन और कृष्ण की वंशी भक्ति साहित्य में प्रेम और आत्मसमर्पण की अनुपम अभिव्यक्ति हैं। वंशी की ध्वनि पर गोपियों का खिंचा चला आना इस बात का प्रतीक है कि जब भीतर सत्य और परमात्मा के प्रति अनुराग जागता है, तब मन उच्चतर उद्देश्य की ओर मुड़ने लगता है। गोपियाँ भागवत में श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम रखने वाली भक्त हैं। उन्हें केवल इंद्रियों का प्रतीक मान लेना एक संभावित आध्यात्मिक रूपक हो सकता है, कथा का संपूर्ण अर्थ नहीं। उनकी भक्ति सांसारिक स्वार्थ और अहंकार से ऊपर उठा समर्पण है। महारास को लौकिक प्रेम तक सीमित करना उसकी गहराई को छोटा करना होगा। वैष्णव परंपरा में यह ईश्वर और भक्त के प्रेम का विशिष्ट उत्सव है।
जीवन का बड़ा संघर्ष मन और इंद्रियों के बीच है। आँखें आकर्षक वस्तु की ओर दौड़ती हैं, कान प्रशंसा सुनना चाहते हैं, जीभ स्वाद के पीछे भागती है और मन इनमें उलझकर अशांत होता है। गीता कहती है कि इंद्रियों से श्रेष्ठ मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मतत्त्व है। यह शिक्षा इच्छाओं का गुलाम बनने के बजाय विवेकपूर्ण जीवन की प्रेरणा देती है। जब इंद्रियाँ बिना विचार के चलाती हैं, तब आवेग और पछतावा बढ़ता है। जब मन विवेक के मार्गदर्शन में रहता है, तब निर्णयों पर नियंत्रण रहता है। महारास को इस दृष्टि से आंतरिक रूपक मान सकते हैं कि मन, बुद्धि और इंद्रियाँ जब सत्य, प्रेम और सदाचार के अनुरूप चलें, तब जीवन में समन्वय आता है। इंद्रियों का दमन ही साधना नहीं है। सुंदरता देखना, संगीत सुनना, स्वाद लेना जीवन के स्वाभाविक पक्ष हैं। आवश्यकता उन्हें विवेक और मर्यादा से जीने की है।
प्रत्येक गोपी के साथ कृष्ण का उपस्थित होना भक्ति का गहरा प्रसंग है। इसका अर्थ है कि ईश्वर किसी एक के प्रेम तक सीमित नहीं, प्रत्येक भक्त के लिए सुलभ हैं। इसका सामाजिक संदेश भी है कि सच्चा प्रेम बाँधना नहीं, स्वीकार करना है। जहाँ ईर्ष्या और स्वामित्व है, वहाँ बंधन है और जहाँ करुणा और सम्मान है, वहाँ विस्तार है। भक्ति का मूल्य बाहरी प्रदर्शन से नहीं, आचरण, विनम्रता और संवेदनशीलता से मापा जाना चाहिए।
ब्रज केवल कल्पना नहीं, भारत की वास्तविक सांस्कृतिक भूमि है। मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगाँव श्रीकृष्ण की कथाओं और उत्सवों से जुड़े हैं। साथ ही ब्रज हृदय की अवस्था भी है। जहाँ प्रेम, करुणा, सेवा और दूसरे के सुख में अपना सुख देखने की क्षमता हो, वहाँ ब्रज की चेतना है। यमुना केवल मन की नदी नहीं, ब्रज की जीवनरेखा हैं। उनकी आध्यात्मिक महत्ता के साथ उनकी स्वच्छता और पारिस्थितिकी की रक्षा भी हमारा दायित्व है। वृंदावन की भक्ति केवल मंदिर दर्शन तक सीमित न रहे, वहाँ के पर्यावरण, पशु पक्षियों और स्थानीय निवासियों के प्रति संवेदनशीलता भी धर्म का हिस्सा बने।
रास में गोपियों के मन में विशेष होने का भाव आने पर कृष्ण के अंतर्ध्यान होने और फिर व्याकुल खोज का प्रसंग भक्ति में विरह और उत्कंठा का मार्मिक चित्रण है। इसका संदेश है अहंकार का त्याग। जब साधक स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगता है, तब विनम्रता घटने लगती है। भक्ति पदक नहीं है, अहंकार को पहचानने और प्रेमपूर्वक जीने की सतत प्रक्रिया है। साधना का प्रमाण जप की संख्या या आयोजन की भव्यता नहीं, बल्कि यह है कि क्रोध कितना घटा, व्यवहार कितना मधुर हुआ और संवेदना कितनी बढ़ी।
शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर चंद्रप्रकाश में रखने की परंपरा श्रद्धा और पारिवारिक सहभागिता का उत्सव है। यह वैज्ञानिक रूप से अमृत बन जाती है या आँखों की ज्योति बढ़ाती है, इसके विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं। खीर पौष्टिक हो सकती है, पर उसकी पौष्टिकता सामग्री और मात्रा पर निर्भर है। यदि खीर बाहर रखें तो धूल और कीटों से सुरक्षित रखें और लंबे समय तक सामान्य तापमान पर न छोड़ें। परंपरा का आनंद विवेक के साथ लेना ही श्रद्धा और ज्ञान का संतुलन है।
शरद पूर्णिमा को केवल चंद्र दर्शन या खीर तक सीमित न रखें। कुछ समय शांत बैठकर देखें कि कौन सी इच्छाएँ तनाव देती हैं और कौन सी आदतें संबंध कमजोर करती हैं। कृष्ण की वंशी को भक्ति की पुकार मानें तो उत्तर आचरण से दें। सत्य बोलें, विश्वास रखें, प्रकृति का सम्मान करें और जरूरतमंद की सहायता करें। इंद्रियों को शत्रु नहीं, विवेकपूर्ण जीवन का सहयोगी बनाएँ। बाहरी चंद्रमा शीतलता देता है, भीतर का विवेक दिशा देता है। ब्रज प्रेम की परंपरा से जोड़ता है और महारास समर्पण व विनम्रता सिखाता है। मन का चंद्रमा निर्मल हो, इंद्रियों का व्यवहार संयमित हो और हृदय में प्रेम का महारास चलता रहे, यही मंगलकामना है। (विभूति फीचर्स)

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