शिक्षक – प्रदीप सहारे

शिक्षक दिवस पर,
मैंने कहा
एक निवृत्त शिक्षक से —
“सर,
पहले था
आपकी छड़ी का डर।
आपका आदेश था,
सर आँखों पर।
विद्यार्थी भी कांपते,
आँखें देख थर-थर।
लेकिन,
प्रश्न यह था कि,
कैसे चला लेते थे
कम तनख़्वाह में
अपना घर?
क्या नहीं लगता था
आपको भविष्य का डर?
क्या कहेंगे आप
आज की शिक्षा व्यवस्था पर?”
शिक्षक ने अपना चश्मा उतारा,
लंबी सफेद शर्ट संवारी,
फिर गला खंखारा,
और बोले —
“हमें भरोसा था
हमारी शिक्षा पर।
शिक्षा निर्भर थी
अनुशासन पर।
अनुशासन का डर,
विद्यार्थी बनते निडर।
जिनके हाथों में ,
भविष्य की बागडोर।
अब अनुशासन के ऊपर
बैठा है प्रशासन।
जिसका आदेश — शिरासन।
माँ-बाप भी हैं अलर्ट,
थोड़ी करो कड़क शिक्षा —
तो धमकी मिलती, जाता हूँ कोर्ट।
विद्यार्थी भी अब रखते तमंचे,
पिंट्या-बबलू हैं उनके चमचे।
अब नहीं,
किसे किसी का डर।
सब कुछ चल रहा है
व्यवस्था पर निर्भर।
व्यवस्था सिमट गई
संस्था-संचालक के घर।
महंगी फ़ीस, किताब, दप्तर,
सब कुछ उसी के दर पर,
सब कुछ उसी के द्वार पर।”
यह सब सुनकर
मैं झाँकने लगा इधर-उधर।
नहीं मिला पा रहा था नज़र।
बंद की कलम,
समेटा जो लिखा एक कागज़ पर —
क्या सवाल करूँ व्यवस्था पर,
मेरा भी लड़का-लड़की पढ़ रहे,
स्कूल का नाम है —
“सेंट ज़ेवियर”
– प्रदीप सहारे- नागपुर, महाराष्ट्र
मोबाईल -7016700769




