शिव अंतर्यामी – श्याम कुंवर भारती

देवों के देव महादेव कैलाशी तुम अविनाशी।
सुर सरी गंगा बसे शिव संग गौरा नगरकाशी।
औघड़दानी महादानी सर्वज्ञानी शिव अंतर्यामी।
भक्त अज्ञानी करो क्षमा नादानी हे शिव स्वामी।
जय नीलकंठ ग्रीवा भुजंग भभूत अंग शोभित।
कर मध्य डमरू बाजत ललाट चंदा रंग मोहित।
झन झंकार त्रिशूल बाजत भाल त्रिपुंड सोहत।
काल कराल नेत्र विशाल रूप महाकाल मोहत ।
जटाधारी त्रिपुरारी त्रिनेत्र धारी जटा बीच गंगा।
पिनाक धारी वैरागी भस्म धारी शिव मस्त मलंगा।
हर हर महादेव कर कर शंकर जग कल्याण।
कट कट काटो कष्ट नर नार हर हर अज्ञान।
नृत्य करत शिव शक्ति नटराज मृदंग है बाजत ।
नमन करत त्रिलोक तेरे संग सब देव है राजत।
उमा पति त्रिलोकपति कैलासपति विश्वनाथ।
करुणा पति देते गति पशुपति बाबा वैद्यनाथ।
भक्त भारती पुकारत चरण पखारत राह बुहारत।
सजल नेत्र रूप निहारत कृपा तेरी जन्म संवारत।
– श्याम कुंवर भारती ( राजभर), बोकारो,झारखंड


